बंग-भंग आंदोलन के समय यह गीत क्रांति का मंत्र बनकर गूंजा और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आंदोलन की चेतना जगाई।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसके दो छंदों को स्वीकार किया था, जबकि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्रदान किया।
संयोजक गुप्ता ने कहा, “वन्दे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। इसने स्वतंत्रता सेनानियों के हृदय में मातृभूमि के प्रति समर्पण, त्याग और बलिदान की भावना जाग्रत की। यह गीत हमें सिखाता है कि एकता में ही शक्ति निहित है।”
उन्होंने आगे कहा कि यह गीत भक्ति और शक्ति दोनों का अद्भुत संगम है। जब सभी ने इसके स्वर में स्वर मिलाया तो पूरा वातावरण राष्ट्रगौरव से भर उठा। यह आयोजन युवाओं में देशभक्ति की भावना को जाग्रत करने और राष्ट्रहित में योगदान देने की प्रेरणा प्रदान करेगा।
स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणास्रोत राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने के ऐतिहासिक अवसर पर गुरुवार को सनातन जागृति मंच के तत्वावधान में स्थानीय हनुमानगढ़ी परिसर में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मंच के सदस्यों और स्थानीय नागरिकों ने एक साथ वन्दे मातरम् का सामूहिक गायन किया, जिससे पूरा परिसर देशभक्ति के रंग में रंग गया।
कार्यक्रम के संयोजक दिलीप कुमार गुप्ता ने बताया कि वन्दे मातरम् मूल रूप से बंकिमचंद्र चटर्जी के प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा है। इस गीत का प्रथम सार्वजनिक गायन वर्ष 1896 में हुआ था, जिसके बाद यह स्वतंत्रता संग्राम का अमर प्रतीक बन गया।

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