लॉकडाउन में फर्जी नियुक्ति, असली हकदार को दरकिनार कर रचा गया खेल
Uttar Pradesh : बलरामपुर जिला में मदरसा नियुक्ति से जुड़ा एक बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। इस खुलासे ने न केवल मदरसा प्रबंधन बल्कि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की कार्यप्रणाली और निगरानी तंत्र को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। मामला नगर तुलसीपुर स्थित मदरसा जामिया अनवारूल उलूम का है, जहां कोरोना लॉकडाउन जैसी आपात स्थिति के दौरान नियमों को दरकिनार कर नियुक्ति प्रक्रिया को अंजाम दिया गया।
मृतक आश्रित कोटे में सहायक शिक्षक पद पर नियुक्ति के पात्र तुलसीपुर निवासी मोहम्मद हसन रज़ा को कथित तौर पर फर्जी ढंग से अयोग्य घोषित कर कनिष्ठ लिपिक पद पर तैनात दिखा दिया गया, जबकि उसी अवधि में सहायक शिक्षक पद पर किसी अन्य की नियुक्ति कर दी गई। आरोप है कि इसके लिए हसन रज़ा के फर्जी हस्ताक्षर कर नोटरी शपथ पत्र तैयार किया गया और मदरसा बोर्ड को भेज दिया गया।
शिकायतों को वर्षों दबाए रखा गया
शिकायतकर्ता इमरान खान का कहना है कि नियुक्ति के समय ही स्थानीय मदरसा प्रबंधन, तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और मदरसा बोर्ड के उच्च अधिकारियों से शिकायत हुई थी। बावजूद इसके, शिकायतों को वर्षों तक नजरअंदाज किया गया।
करीब पांच साल बाद शासन स्तर पर जब मामला पहुंचा, तो उप सचिव के निर्देश पर जांच कराई गई। हस्ताक्षरों की विधि विज्ञान प्रयोगशाला से कराई गई जांच में यह पुष्टि हुई कि विवादित शपथ पत्र पर किए गए हस्ताक्षर हसन रज़ा के नहीं हैं और यह कूटरचना मदरसे के लिपिक अज़ीज़ अहमद अंसारी द्वारा की गई थी।
तीन पर मुकदमा, लेकिन सवाल बरकरार
जांच रिपोर्ट के आधार पर मदरसे के प्रधानाचार्य मेराज अहमद, लिपिक अज़ीज़ अहमद अंसारी सहित तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। हालांकि, समाचार लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी। इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जिन अधिकारियों की निगरानी में यह पूरा प्रकरण चला—तत्कालीन जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी और मदरसा बोर्ड के रजिस्ट्रार—उन पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पर खुला मामला
तुलसीपुर निवासी मो० इमरान खान ने इस पूरे प्रकरण की शिकायत शासन से करते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद ही जांच शुरू हुई और फर्जीवाड़ा सामने आया। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि मदरसा स्तर के कर्मचारियों के साथ-साथ विभागीय उच्चाधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच हो।
सबसे बड़ा सवाल
जब फर्जी दस्तावेज बोर्ड तक पहुंचे, वेतन जारी हुआ और वर्षों तक शिकायतें दबाई गईं—तो क्या यह सब बिना विभागीय संरक्षण के संभव था? क्या कार्रवाई केवल तीन लोगों तक सीमित रहेगी या जांच की आंच सिस्टम के ऊपरी गलियारों तक भी पहुंचेगी? फिलहाल, यह सवाल बलरामपुर ही नहीं, बल्कि मदरसा व्यवस्था पर गहरी छाया बनकर खड़ा है।

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