मार्च 2022 में शासन ने सात मदरसों के मानक पूर्ण न होने के कारण इनके अनुदान वापस लिए जाने की संस्तुति की थी। लेकिन शासन के आदेश के डेढ़ साल गुजर जाने के बाद भी मदरसा बोर्ड संतकबीर नगर के दारुल उलूम अहले सुन्नत फैजुल इस्लाम नामक केवल एक मदरसे की मान्यता ही निलंबित करा सका है। शेष छह मदरसे अभी भी सरकार से अनुदान पा रहे हैं और राजकोष को प्रतिमाह करोड़ों का चूना लगा रहे हैं। समाजसेवी सस्थाओं ने मदरसों में व्याप्त भ्रष्टाचार की जांच कराए जाने की मांग की है।
मिली जानकारी के मुताबिक वर्ष 2017 में प्रदेश के ऐसे सभी अनुदानित मदरसे जो सरकारी फंड पा रहे थे, शासन द्वारा उनके मानक को जांचने के निर्देश सभी जिलों में जिलाधिकारियों को भेजे गए। लगभग सात-आठ महीने में जिलों से रिपोर्ट आई। जांच में यह तथ्य प्रकाश में आया कि पूरे प्रदेश में लगभग पैंतीस मदरसे ऐसे हैं जो या तो ग्राम पंचायत की सरकारी जमीनों को कब्जा करके बनाए गए हैं या वे मदरसा नियमावली में दिए गए मानक को पूरा ही नहीं करते हैं। शासन द्वारा इन सभी मदरसों को मानक पूरा करने के लिए उन्हें तीन बार का समय भी दिया गया। कुछ समय बीतने के बाद लगभग पच्चीस मदरसों ने मानक पूरा होने का लिखित शपथपत्र दिया। सरकार ने इन शपथपत्रों के आधार पर संबंधित मंडलों के मंडलायुक्तगण से दोबारा जांच कराने का निर्णय लिया। वर्ष 2021 में सभी मंडलायुक्तगण की ओर से जांच रिपोर्ट शासन को भेज दी गई जिसमे सात मदरसे मानकविहीन पाए गए जिसमें से कुछ सरकारी जमीनों पर कई साल से अवैध कब्जा करके चला रहे थे। इन मंडलों के मंडलयुक्तगण ने प्रदेश के कुल सात मदरसों की मान्यता समाप्त करने की संस्तुति की।
मंडलायुक्तगण की आख्या के आधार पर शासन ने 25 मार्च, 2022 को इन सभी सात अनुदानित मदरसों की मान्यता समाप्त करने का विधिवत लिखित आदेश जारी कर दिया। इस आदेश का अनुपालन कराने के लिए तत्कालीन रजिस्ट्रार मदरसा बोर्ड ने सभी सातों मदरसों को नोटिस जारी की।
बताते हैं कि मदरसा बोर्ड नोटिस जारी होते ही इन मदरसों में हड़कंप मच गया और मदरसा माफिया नोटिस को दबवाने के लिए सक्रिय हो गए। इन सात मदरसों में दो मदरसे तो अकेले प्रयागराज से थे जिसकी नोटिस वहां के तत्कालीन उपनिदेशक जगमोहन सिंह के माध्यम से तामील कराई गई थी। उक्त मदरसो पर कार्रवाई की बजाय तत्कालीन रजिस्ट्रार और बोर्ड के पदाधिकारियों की ओर से आंखें मूंद ली गईं।
सबसे बड़ी बात कि इतने गंभीर प्रकरण में मदरसा बोर्ड के तत्कालीन रजिस्ट्रार जगमोहन सिंह ने अपने पूरे कार्यकाल में मदरसा नियमावली में दी गई व्यवस्था के अनुपालन में इन मदरसों की मान्यता प्रत्याहरित करने के लिए न तो सुनवाई के लिए कोई तिथि निर्धारित की और न ही मान्यता प्रत्याहरित करने की दिशा में ही कोई अग्रिम कार्यवाही की। सूत्रों की मानें तो उनके द्वारा जान-बूझकर इस प्रकरण को दबाए रखा गया। वाराणसी के प्रादेशिक मदरसा शिक्षक संघ के एक शीर्ष नेता ने नाम न छपने की शर्त पर यह बताया कि वास्तविकता तो यह है कि इनमें से कुछ मदरसों का कई वर्षों का एरियर बकाया था जिनके जिसके विधिवत बंदरबांट की तैयारी चल रही थी,इसलिए भी इस पूरे प्रकरण को जानबूझकर दबाकर रखा गया। क्योंकि यदि मदरसे की मान्यता प्रत्याहरित हो जाती तो फिर तयशुदा बन्दरबांट में भी बाधा आती।
स्पष्ट है कि मदरसा बोर्ड के तत्कालीन रजिस्ट्रार जगमोहन सिंह और बोर्ड के अन्य पदाधिकारियों की निष्क्रियता के कारण राजकीय कोष को करोड़ों का चूना लगा। यदि समय रहते इन मदरसों की मान्यता प्रत्याहरित हो जाती तो निश्चित रूप से जनता की गाढ़ी कमाई से वसूले गए टैक्स की बचत होती। स्वयंसेवी संस्था प्रतिष्ठा ने प्रकरणों की जांच कर कर मदरसों में व्याप्त भ्रष्टाचार व लिप्त अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

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